मंगलवार, 4 जुलाई 2017

पढ़ा लिखा बेरोज़गार...

अच्छे दिन तो शायद किसी के आएं हो या नहीं पर आज भी बेरोज़गारों के अच्छे दिन कई कोस दूर होते दिख रहे हैं.ज़िन्दगी की भाग दौड़ में ये पढ़े लिखे बेरोज़गार दिन प्रतिदिन बदलती सरकार और उसके झूठे वादों के  कारण आज भी मकड़ जाल में घिरे पड़े हैं.आज चाहे वो यूपी हो या बिहार, छत्तीसगढ़ हो या झारखण्ड सभी इस परेशानी से जूझते नज़र आ रहे हैं.आज प्राइवेट हो या सरकारी नौकरी कोई भी किसी से कम नहीं हैं.कुछ अच्छे भविष्य के सपने देखने वाले आज के युवा समाज में चल रहे तरह तरह की डिग्री और डिप्लोमा कोर्सेज में एड्मिशन ले रहे हैं.अपनी सुनहरी ज़िन्दगी को सवारने के लिए ये तमाम कंपनियों के आये दिन चक्कर भी काटते हैं.प्रदेश बदल रहा हैं देश बदल रहा हैं पर आज भी इन युवाओं की स्थिति वहीँ हैं जहाँ पर थी.आज देश का प्राण कहलाने वाला युवा ही समाज के हर वर्ग में समाज में सबसे पीछे खड़ा हैं.आज रजनीति का दंश बड़ी मात्रा में युवा ही झेल रहा हैं.एक तरफ वो युवा है जो अपने भविष्य को बनाने के लिए आये दिन अपनी सरकार को बदलकर ये देखना चाहता है की उन लोगों के लिए शायद सरकार भी कुछ सोचे पर,इस बनती बिगड़ती सरकार से इन युवाओं को क्या मिल रहा है?या तो केवल समय जा रहा या फिर बस पैसा....सबको मौजूदा सरकार से बहुत उम्मीदें है.
सरकार को, इस राजनीति को,यहाँ तक की पूरे देश को ये सोचना चाहिए की जिस कंधे पर आप बन्दूक रख कर चलाना चाहते है जब वो कन्धा ही न रहेगा तो इस देश क विकास में हम कल्पना भी कैसे कर सकते हैं?आज चोरी,हत्या,लूट,नक्सलवाद,सभी  बेरोज़गारी का बिगड़ता रूप है.युवाओं को बस कुछ शब्दों,कुछ बयानों और युवा दिवस 12 जनवरी के रूप में जगह न मिले बल्कि इन युवाओं को ऐसे मौके दें जिससे वो अपने सपनों और भविष्य को सुधार सकें.

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